Friday, 1 April 2016

mendleev life story


मेंडलीफ का जन्म साइबीरिया के टोबोल्स्क में हुआ था। मैंडलीफ के पिता का नाम इवान पोल्वोविच मेंडलीफ था। मैंडलीफ के पिता का नाम इवान पोल्वोविच मेंडलीफ था।तथा उनकी  माता का नाम मारिया दमित्रीयेवना मेंडलीफ था। उनके दादा पावेल मैक्सीमोविच रूस के एक चर्च में पादरी थे।
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा उनके निवास स्थान के पास में ही हुई में हुई। जब आप 13 साल कके थे तब आपके पिता की म्रत्यु हो गई।तथा आपके पिता की फैक्ट्री में आग लग गई।जिस कारन आपके परिवार का काफी नुकसान हो गया। संपत्ति नष्ट होने के कारण आपके परिवार को 1849 में सेंट पीटर्सबर्ग में जाकर रहना पड़ा,जिसके कारण मेंडलीफ को वहीं के मेन पेडागोगियल इंस्टीट्यूट में प्रवेश लेना पड़ा सन1857 ई० में मेंडेलीफ़ ने पीटर्सबर्ग से स्नातक परीक्षा उतीर्ण की अच्छे अंक प्राप्त करने के परिणामस्वरूप आपको स्वर्णपदक मिला। स्नातक के बाद आपको टीबी हो गया, टी बी के कारण आप क्रिमन प्रायद्वीप पर रहने आ गए। और यहाँ पर आपने इलाज करवाया।आप जब 1857 में स्वस्थ हो गए तब सेंट पीटर्सबर्ग लौट आये। दो वर्ष बाद आपने सिमफरोपोल और फिर ओडेसा के जिमनाज़ियमों मैं शिक्षक के रूप में कार्य किया। सन 1851 ई० में आपने मास्टर ऑफ साइंस की उपाधि प्राप्त की। आपने 'विशिष्ट आयतन' विषय पर  निबंध लिखा। तत्पश्चात मैंडलीफ 2 वर्ष के लिये वैज्ञानिक कमिशन के साथ विदेश यात्रा के लिये गए।सन 1860  ई० में आपने एर्ल्सरूका में होने वाले 'विश्व रसायन सम्मेलन' में भाग लिया। यात्रा से वापस आने पर आपने पीटर्सबर्ग टेकनोलौजिकल इंस्ट्टियूट में प्रोफेसर के पद पर कार्य किया।उसके  दो वर्ष बाद आप पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय में रसायन के प्रोफेसर  हुए। यहाँ पर आपने सर्वाधिक वैज्ञानिक तथा शिक्षक के रूप में कार्य किया। सन 1893 ई० में मेंडेलीफ़ को 'ब्यूरों ऑफ वेट्स ऐंड मेज्हर्स' (तौल माप संस्थान) के निदेशक पद पर नियुक्त किया गया। इस समय आपने वैज्ञानिक और साहित्यिक कार्य दोनों किये

मेंडेलीफ़ के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य तत्वों के आवर्त सारणी से संबंधीत है। मैंडलीफ ने तत्वों की जो आवर्त सारणी प्रस्तुत की, उसमें आधुनिक आवर्त के कारण काफी सुधार हो गए हैं, मैंडलीफ की सारणी उपयोगी है। मेंडेंलीफ़ ने अपने आवर्त में नए तत्वों के बारे में बताया। जो उस समय प्रचलन में नही थे।

 मेंडलीफ़ ने सन 1904 में  'रसायन सिद्धांत' नाम की एक पुस्तक लिखी।आपने भूगर्भ विज्ञान, भूभौतिकी आदि का अध्ययन किया।  सन 1859 से 1861 में आपने तरल के केशिकत्व और स्पक्ट्रोस्कोप की कार्यपद्धति पर कार्य किया। 1861 में आपकी किताब स्पक्ट्रोस्कोप काफी प्रसिद्ध हुई।मैंडलीफ की म्रत्यु 02 फरवरी 1907 को हुई थी।

Saturday, 27 February 2016

Homi Jahagir Bhabha life




होमी जहागीर भाभा को कौन नहीं जानता है। हम यहाँ उनकी full life storय जानेंगे। होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टुबर 1909 में हुआ था।आप मुम्बई के एक पारसी परिवार के रहने वाले थे। आपके पिता जहांगीर भाभा एक प्रसिद्ध वकील थे।तथा आपकी माता उच्च परिवार से थी।आपके परिवार में सभी ने आपको काफी आगे तक पढाया। आपको बचपन से ही पुस्तके पढने में विशेष रूचि थी। आप अपनी क्लास में अव्वल दर्जे के student थे। आपने बचपन से ही ज्ञानवर्द्धन पुस्‍तकों का अध्‍ययन किया। आपने मात्र15 वर्ष की उम्र में  आइन्स्टीन के सापेक्षता का तर्क समझ लिया और उसका अध्ययन किया। आपकी शुरुआती शिक्षा कैथरेडल स्कूल में सम्‍पन्‍न हुई। जब आप ऊँची क्लास मई गए तब आपको कैथरेदल स्कूल छोङना पढास।उसके बाद आपको जॉन केनन स्‍कूल में admission कराया। आपने एलफिस्टन कॉलेज से 12वीं पास की। फिर आप कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गये।आपको सरकार  की तरफ से लगातार छात्रवृत्ति मिलती रही। आपने सन1930 में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री हासिल की।सन 1934 में आपकी पीएचडी पूर्ण हो गई। होमी जहागीर भाभा वापस भारत आ गए। आपने अपने देश के लिए कार्य करने का निश्चय किया।होमी भाभा ने अंतरिक्ष में पृथ्‍वी के वायुमण्‍डल में प्रवेश करने वाली कॉस्मिक किरणों पर कार्य किया।आपने 'कॉस्केटथ्योरी ऑफ इलेक्ट्रान'सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसी समय आपने डेराक रदरफोर्ड एवं नील्सबेग के साथ काम किया। आपको सन 1940 में indiyan science society बंगलुरू में रीडर के पद पर रखा। वहां पर आपने कॉस्मिक किरणों की खोज के लिए एक विभाग बनाया जिसमे केवल कॉस्मिक किरणों पर खोज करते थे। आपको सन 1941 में रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुन लिया गया। उस समय आपकी आयु मात्र 31 वर्ष थी।इतनि कम उम्र में रॉयल सोसाइटी का सदस्य बनना आसन नही था। होमी जहागीर भाभा की प्रेरणा से टाटा ने देश में वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए 'टाटा इन्सट्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च' की स्‍थापना की गई। जिसके आपकओ महानिदेशक चुन गया। होमी जहागीर भाभा ने उसी समय आपने atomic energy के बारे में अध्ययन किया।आपने इस दिशा में खोज प्रारम्‍भ करी।जिसमे काफी मेहनत लगी परन्तु आपने हर नहीं मानी ।भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आपको जी जान से मेहनत करना पङी।सन 1955 में होमी भाभा को जिनेवा में होने वाले program में बुलाया। वहां पर उनकी खोज को सुनकर कनाडा सरकार ने भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने में सहयोग दिया।इन दोनों देशो ने मिलकर एक योजना बनाइ। जिसे सायरस परियोजना कहते है। इस योजना को प्रोत्साहन मिला। सन 1960 में यह योजना पूर्ण हुई। तथा सन 1961 में 'जेरिलिना परियोजना' भी सफल हुई। इन रिएक्टरों के निर्माण से देश में atomic power से विद्युत् उत्पादन हुआ।होमी जहांगीर भाभा के प्रयत्नों से राजस्थान में राणाप्रताप सागर तथा तमिलनाडु में कल्पकम नामक स्थान में भी परमाणु ऊर्जा संयत्र स्थापित किये गये। उन्‍होंने इन संयंत्रों के लिए मंहगे यूरेनियम की तुलना में देश में उपलब्‍ध थोरियम पर कार्य किया। होमी जहागीर भाभा की योजना से बंगलुरू के पास भूगर्भीय विस्फोटों तथा भूकंपो के प्रभावों का अध्यनन करने के लिए एक केन्द्र स्थापित किया गया। होमी जहागिर भाभा की 24 जनवरी 1966 को विमान हादसे में म्रत्यु हो गई। आप comment के माध्यम से हमे जानकारी भेज सकते है या कोई अन्य प्रश्न पूछ सकते है।

Monday, 22 February 2016

Jems clark maxwell life



मैक्सवेल महान भौतिकशास्त्री और गणितज्ञ था। जिसका जन्म 13 जून 1831 को हुआ था.। यह वही वर्ष था जब महान वैज्ञानिक फैराडेने विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electro magnetic Induction) की खोज की थी यह एक क्रांतिकारी खोज थी और बाद में इसी विषय में मैक्सवेल ने अपना शोध कार्य किया।मैक्सवेल के अनुसार निर्वात में विद्युत क्षेत्र तथा चुम्बकीय क्षेत्र तरंगों के रूप में गमन करता है.इन तरंगो की गति प्रकाश की गति से अधिक होती है।इन तरंगो को विद्युत चुम्बकीय तरंगें (Electromagnetic Rays) कहते है।आपने प्रकाश एवं रेडियो तरंगों को विद्युत चुम्बकीये तरंगें सिद्ध किया।आपने ये भी खोज की कि इन्हें चलने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।मात्र 18 वर्ष की आयु में ही आपके दो पत्र प्रकाशित हुए। जिनमें से इसमे से प्रथम पत्र वस्तुओ के प्रत्यास्थता के गुण के ऊपर था। तथा दूसरा ओवल वक्र के सम्बन्ध में था। इसके बाद आपने रंगों के गुणों अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला की सभी प्रकार के रंग वास्तव में तीन आधार रंगों (Base or Primary colours) का मिश्रण होते हैं। इन रंगों यानी लाल, हरे व नीले रंगों को अलग अलग अनुपात में मिलाकर कोई भी रंग बनाया जा सकता है।मैक्‍सवेल की इस खोज ने रंगीन छपाई की

बुनियाद डाली। वर्तमान में हर प्रकार की रंगीन छपाई मशीनें, रंगीन टी.वी., रंगीन फोटोग्राफी, रंगीन कंप्यूटर मॉनिटर, फोन स्क्रीन सभी कुछ इसी सिद्धांत के आधार पर कार्य करते हैं। कभी कभी हरे प्राईमरी कलर के स्थान पर पीला रंग इस्तेमाल होता है।आपने Fish Eye Lens का भी आविष्कार किया. उसने शनि ग्रह के छल्लों के बारे में निष्कर्ष निकाला कि यह दरअसल बहुत छोटे कणों का समूह है जो उस ग्रह की परिक्रमा कर रहा है. किंग्स कॉलेज में काम करते हुए मैक्सवेल ने विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का भौतिक मॉडल तैयार किया, जिसकी खोज फैराडे ने की थी. उसी समय उसने प्रकाश के ध्रुवण (Polarization) पर चुम्बकीय प्रभाव की खोज की. जो विद्युत तथा चुम्बकत्व का प्रकाश के साथ संयुक्तीकरण का पहला चरण था. इसका अंतिम निष्कर्ष मैक्सवेल की चार समीकरणों के रूप में सामने आया, जिनकी गिनती भौतिक विज्ञान की महानतम समीकरणों के रूप में होती है.

इनके द्बारा प्रकाश तथा अन्य विद्युतचुम्बकीय तरंगों का वेक्टर मॉडल प्रस्तुत हुआ. तथा रेडियो, माइक्रोवेव जैसी किरणों का आविष्कार संभव हो सका. दूसरे शब्दों में मैक्सवेल की खोजों ने रेडियो, टी.वी. रडार तथा अन्य संचार उपकरणों के आविष्कार के रास्ते सुझाए. ऊष्मागतिकी में कार्य करते हुए उसने गैसों का गतिक मॉडल प्रस्तुत किया. इस मॉडल द्बारा गैसों की विशेषताओं का अध्ययन होता है. साथ ही उसने यांत्रिकी (Mechanics) का ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के साथ सम्बन्ध स्थापित किया. मैक्सवेल का बनाया मॉडल पदार्थ की चौथी अवस्था प्लाज्मा के अध्ययन में भी काफी उपयोगी सिद्ध हो रहा है. यह एक सुखद संयोग कहा जाएगा कि जिस वर्ष मैक्सवेल की मृत्यु हुई उसी वर्ष (1879) महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आईस्टीन का जन्म हुआ।

Tuesday, 16 February 2016

Mokshgundam vishwaweraya life


डॉ. एम. विश्‍वेश्‍वरैया का जन्म 15 सितम्‍बर 1861 को, बंगलौर के कोलर जिले के मुदेनाहल्‍ली नामक गाँव् में हुआ था। इनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के ‘मोक्षगुण्‍डम’ नामक स्‍थान के रहने वाले थे।इस कारन आपका नाम मोक्ष्गुन्दम विश्वेश्वरं पड़ गया। इनके पिता का नाम पं0 श्रीनिवास शास्‍त्री तथा माँ का नाम व्‍यंकचम्‍मा था। इनके पिता संस्कृत के विद्वान थे और वे धर्मपरायण ब्राह्मण के रूप में जाने जाते थे। बचपन से ही विश्‍वेश्‍वरैया को रामायण, महाभारत ओर पंचतंत्र की प्रेरक कथाएं सुनने को मिलीं, जिससे उन्‍होंने प्रेरणा ग्रहण की।विश्‍वेश्‍वरैया की प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय में ही हुई। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे इसलिए हमेशा अपने अध्‍यापकों के प्रिय रहे। लेकिन अभी उन्‍होंने जीवन के 14 वसंत ही देखे थे कि उनके पिता की मृत्‍यु हो गयी। आगे की शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए वे अपने मामा रमैया के पास बंगलौर चले गये। मामा ने विश्‍वेश्‍वरैया की इच्‍छा देखकर उन्‍होंने विश्‍वेश्‍वरैया को मैसूर राज्‍य के एक उच्‍चाधिकारी के घर पर बच्‍चों का ट्यूशन दिलवा दिया।
उस अधिकारी का घर विश्‍वेश्‍वरैया के मामा के घर से लगभग 15 किलोमीटर दूर था। विश्‍वेश्‍वरैया प्रतिदिन पैदल ही इस दूरी को तय करते और बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ाकर लौट आते। पढ़ाई के लिए ट्यूशन की व्‍यवस्‍था हो जाने के बाद विश्‍वेश्‍वरैया ने सन 1875 में बंगलौर के सेन्‍ट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। सन 1880 ई0 में वहाँ से उन्‍होंने बी.ए. की परीक्षा विशेष योग्‍यता के साथ उत्‍तीर्ण की। उनकी इच्‍छा थी कि वे आगे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करें, पर आर्थिक स्थिति उन्‍हें इसकी अनुमति नहीं दे रही थी। सेन्‍ट्रल कॉलेज के प्रिंसिपल, जोकि एक अंग्रेज थे, विश्‍वेश्‍वरैया की योग्‍यता से बहुत प्रभावित थे। उन्‍होंने विश्‍वेश्‍वरैया की मुलाकात मैसूर के तत्‍कालीन दीवान श्री रंगाचारलू से करवाई। रंगाचारलू ने विश्‍वेश्‍वरैया की लगन को देखकर उनके लिए छात्रवृत्ति की व्‍यवस्‍था कर दी। इसके बाद विश्‍वेश्‍वरैया ने पूना के ‘साइंस कॉलेज’ में प्रवेश लिया। उन्‍होंने ‘सिविल इंजीनियरिंग’ श्रेणी में मुम्‍बई विश्‍वविद्यालय के समस्‍त कॉलेजों के छात्रों के बीच सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त करते हुए 1883 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्‍त करते ही विश्‍वेश्‍वरैया को बम्‍बई के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियन्‍ता के रूप में नौकरी मिल गयी। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था। अंग्रेज अधिकारी उच्‍च पदों पर आमतौर से अंग्रेजों को ही नियुक्‍त करते थे। विश्‍वेश्‍वरैया ने इस पद पर काम करते हुए शीघ्र ही अंग्रेज़ इंजीनियरों से अपना लोहा मनवा लिया। प्रारम्भिक दौर में विश्‍वेश्‍वरैया ने प्राकृतिक जल स्रोत्रों से इकट्ठा होने वाले पानी को घरों तक पहुँचाने के लिए जल-आपूर्ति और घरों के गंदे पानी को निकालने के लिए नाली-नालों की समुचित व्‍यवस्‍था की। उन्‍होंने खानदेश जिले की एक नहर में पाइप-साइफन के कार्य को भलीभाँति सम्‍पन्‍न करके भी अपनी धाक जमाई।

 विश्‍वेश्‍वरैया के जीवन में सबसे बड़ी चुनौती सन 1894-95 में आई, जब उन्‍हें सिन्ध के सक्खर क्षेत्र में पीने के पानी की परियोजना सौंपी गयी। उन्होंने इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया। उन्‍होंने वहाँ पर बाँध बनवाने की योजना बनवाई। जब उस योजना को प्रारम्‍भ करने का समय आया, तो विश्‍वेश्‍वरैया यह देख कर दु:खी हो गये कि वहाँ का पानी पीने लायक ही नहीं था। इसलिए उन्‍होंने सबसे पहले उस पानी को स्‍वच्‍छ बनाने का फैसला किया। पानी को साफ करने की तमाम तकनीकों का अध्‍ययन करने के बाद विश्‍वेश्‍वरैया इस नतीजे पर पहुँचे कि इस नदी के पानी को साफ करने के लिए नदी की रेत का प्रयोग सबसे आसान रहेगा। इसके लिए उन्‍होंने नदी के तल में एक गहरा कुँआ बनाया। उस कुँए में रेत की कई पर्तें बिछाई गयीं। इस प्रकार रेत की उन पर्तों से गुजरने के बाद नदी का पानी स्‍वच्‍छ हो गया। इस परियोजना के सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न होने के बाद विश्‍वेश्‍वरैया की ख्‍याति चारों ओर फैल गयी और वे अंग्र ने अपनी मौलिक सोच के द्वारा बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने के लिए खड़गवासला बांध पर स्वचालित जलद्वारों का प्रयोग किया। इनकी खासियत यह थी कि बाँध में लगे जलद्वार पानी को रोक कर रखते थे, जब तक वह पिछली बाढ़ की ऊँचाई के स्तर तक नहीं पहुँच जाता था। उसके बाद जैसे ही बाँध का पानी उससे ऊपर की ओर बढ़ता जलद्वार अपने आप ही खुल जाते।
 और जैसे ही बाँध का पानी उसके निर्धारित स्‍तर तक पहुँचता बांध के जलद्वार स्‍वत: ही बंद हो जाते।विश्‍वेश्‍वरैया ने सिर्फ पीने के पानी की समस्‍या का ही निराकरण नहीं किया, उन्‍होंने खेतों की सिंचाई के लिए उत्‍तम प्रबंध किये। इसके लिए उन्‍होंने बाँध से नहरें निकालीं और उनके द्वारा खेतों तक पानी की व्‍यवस्‍था की। विश्‍वेश्‍वरैया ने अपने इन कार्यों के द्वारा पूना, बैंगलोर, मैसूर, बड़ौदा, कराची, हैदराबाद, कोल्हापुर, सूरत, नासिक, नागपुर, बीजापुर, धारवाड़, ग्वालियर, इंदौर सहित अनेक नगरों को जल संकट से पूर्णत: मुक्ति प्रदान कर दी। यह वह दौर था, जब आजादी के लिए आंदोलन अपने पूरे उफान पर था। इस आंदोलन को गति देने के लिए गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक जैसे स्‍वतंत्रता सेनानी सरकारी पदों पर विराजमान भारतीयों को इस आंदोलन से जोड़ने के लिए विशेषरूप से प्रयासरत थे। इन तमाम नेताओं के सम्‍पर्क में आने के बाद विश्‍वेश्‍वरैया ने भारतीय जनमानस तक आम सुविधाएँ पहुँचाने का निश्‍चय लिया और उसके लिए उन्होंने दिन रात एक कर दिया। अपने परिश्रम और लगन के बल पर विश्‍वेश्‍वरैया लोक निर्माण विभाग में तरक्‍की की सीढि़याँ चढ़ते गये। वे 1904 में विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर पर नियुक्‍त हुए। उन दिनों में विभाग के प्रमुख का पद अंग्रेजों के लिए आरक्षित था। विश्‍वेश्‍वरैया ने इसका विरोध करते हुए 1908 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अंग्रेज सरकार उन जैसे योग्‍य व्‍यक्ति को खोना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने विश्‍वेश्‍वरैया से इस फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। पर विश्‍वेश्‍वरैया अपने निश्‍चय से नहीं डिगे। उस समय विभाग की न्‍यूनतम 25 वर्ष की सेवा के उपरांत ही पेंशन का प्रावधान था। हालाँकि विश्‍वेश्‍वरैया की 25 वर्ष की सेवाएँ नहीं हुई थीं, इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने इस नियम को बदलते हुए उन्‍हें पेंशन प्रदान की। अपनी नौकरी से त्‍यागपत्र देने के बाद विश्‍वेश्‍वरैया ने विदेशों की यात्राएँ की और अनेक इंजीनियरिंग संस्‍थानों में जाकर वहाँ से अनुभव अर्जित करने का फैसला किया। उन दिनों बरसात के दिनों में सारे देश में बाढ़ की विभीषिका व्‍याप्‍त हो जाती थी। हैदराबाद के निजाम भी इससे बहुत त्रस्‍त थे। इसलिए विश्‍वेश्‍वरैया के विदेश प्रवेश से लौटते ही वहाँ के निजाम ने उन्‍हें इस समस्‍या से निजात दिलाने की जिम्‍मेदारी सौंप दी। विश्‍वेश्‍वरैया लगभग एक वर्ष तक हैदराबाद में रहे। इस दौरान उन्‍होंने वहाँ पर अनेक बाँधों और नहरों का निर्माण कराया, जिससे वहाँ की बाढ़ की समस्‍या काफी हद तक समाप्‍त हो गयी। उसी दौरान मैसूर राज्‍य के तत्‍कालीन दीवान ने विश्‍वेश्‍वरैया से सम्‍पर्क किया और उनसे मैसूर राज्‍य के प्रमुख इंजीनियर की जिम्‍मेदारी संभालने का आग्रह किया। चूँकि विश्‍वेश्‍वरैया की शिक्षा में मैसूर राज्‍य की छात्रवृत्ति का बड़ा योगदान था, इसलिए वे उनका आग्रह टाल न सके और 1909 में हैदराबाद से मैसूर आ गये। मैसूर राज्‍य की कावेरी नदी अपनी बाढ़ के लिए दूर-दूर तक कुख्‍यात थी। उसकी बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष सैकड़ों गाँव तबाह हो जाते थे। कावेरी पर बाँध बनाने के लिए काफी समय से प्रयत्‍न किये जा रहे थे। लेकिन अन्‍यान्‍य कारणों से यह कार्य पूर्ण न हो सका था। विश्‍वेश्‍वरैया ने जब इस योजना को अपने हाथ में लिया, तो उन्‍होंने मूल योजना में काफी खोट नजर आई। उन्‍होंने मैसूर को बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति दिलाने के लिए कावेरी नदी का वृहद सर्वेक्षण किया और तब जाकर एक विस्‍तृत योजना तैयार की।
विश्‍वेश्‍वरैया ने कावेरी नदी पर बाँध बनाने की जो योजना बनाई थी, उसमें लगभग 2 करोड़ 53 लाख रूपये खर्च होने का अनुमान था। 1909 में यह एक बड़ी राशि थी। लेकिन यह विश्‍वेश्‍वरैया के व्‍यक्तित्‍व का ही प्रताप था कि मैसूर सरकार उनकी इस योजना से सहमत हो गयी और योजना को हरी झण्‍डी दे दी।विश्‍वेश्‍वरैया ने अपनी सूझबूझ और लगन का परिचय देते हुए कावेरी नदी पर कृष्‍णराज सागर बाँध का निर्माण कराया। लगभग 20 वर्ग मील में फैला यह बाँध 130 फिट ऊँचा और 8600 फिट लम्‍बा था। यह विशाल बाँध 1932 में बनकर पूरा हुआ, जो उस समय भारत का सबसे बड़ा बाँध था। बाँध के पानी को नियंत्रित करने के लिए उससे अनेक नहरें एवं उपनहरें भी निकाली गयीं, जिन्‍हें ‘विश्‍वेश्‍वरैया चैनल’ नाम दिया गया। इस बाँध में 48,000 मिलियन घन फिट पानी एकत्रित किया जा सकता था, जिससे 1,50,000 एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई की जा सकती थी और 60,00 किलोवाट बिजली बनाई जा सकती थी। कृष्‍णराज सागर बाँध वास्‍तव में एक बहुउद्देशीय परियोजना थी, जिसके कारण मैसूर राज्‍य की कायापलट हो गयी। वहाँ पर अनेक उद्योग-धंधे विकसित हुए, जिसमें भारत की विशालतम मैसूर शुगर मिल भी बनाई गई। सन 1909 में विश्‍वेश्‍वरैया के चीफ इंजीनियर बनने के तीन साल बाद ही मैसूर राज्‍य के तत्‍कालीन दीवान (प्रधानमंत्री) की मृत्‍यु हो गयी। मैसूर के महाराजा उस समय तक डॉ0 विश्‍वेश्‍वरैया के गुणों से भलीभाँति परिचित हो चुके थे। इसलिए उन्‍होंने विश्‍वेश्‍वरैया को मैसूर का नया दीवान नियुक्‍त कर दिया। इस पद पर विश्‍वेश्‍वरैया लगभग 6 वर्ष तक रहे। दीवान बनने के साथ ही विश्‍वेश्‍वरैया ने राज्‍य के समग्र विकास पर ध्‍यान देना शुरू किया। उन्‍होंने अपने कार्यकाल में शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर बल दिया और प्रदेश में अनके तकनीकी संस्‍थानों की नींव रखी।विश्‍वेश्‍वरैया ने 1913 में स्‍टेट बैंक ऑफ मैसूर की स्‍थापना की। व्‍यापार तक जनपरिवहन को सुचारू बनाने के लिए उन्‍होंने राज्‍य में अनेक महत्‍वपूर्ण स्‍थानों पर रेलवे लाइन बनवाईं। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने इंजीनियरिंग कॉलेज, बंगलौर (1916) एवं मैसूर विश्वविद्यालय की स्‍थापना की। सन 1918 में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्‍होंने पॉवर स्टेशन की भी स्‍थापना की। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने सामाजिक विकास के लिए अनेक योजनाओं को संचालित किया, प्रेस की स्‍वतंत्रता को लागू करवाया और औद्योगीकरण पर बल दिया। सन 1919 में महाराजा से वैचारिक भिन्‍नता के कारण विश्‍वेश्‍वरैया ने अपने पद से त्‍यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे कई महत्‍वपूर्ण समितियों के अध्‍यक्ष एवं सदस्‍य रहे। उन्‍होंने सिंचाई आयोग के सदस्‍य के रूप में अनेक योजनाओं को अमलीजामा पहनाया। बम्‍बई सरकार की औद्योगिक शिक्षा समिति के अध्‍यक्ष के रूप में उन्‍होंने अपनी संवाएँ प्रदान कीं। वे भारत सरकार द्वारा नियुक्‍त अर्थ जाँच समिति के भी अध्‍यक्ष रहे। उन्‍होंने बम्‍बई कार्पोरेशन में भी एक वर्ष परामर्शदाता के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। सन 1921 में आजादी के आंदोलन में सम्मिलित हो गये। उन्‍होंने वाइसराय से विचार-विमर्श किया और स्वराज की माँग पर विचार करने के लिए ‘गोलमेज सम्मेलन’ का समर्थन किया। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने देश की अनेक विकास योजनाओं में भी उत्‍साहपूर्वक भाग लिया। उन्‍होंने बंगलौर में ‘हिन्‍दुस्‍तान हवाई जहाज संयत्र’ एवं ‘विजाग पोत-कारखाना’ प्रारम्‍भ करवाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्‍त उन्‍होंने भ्रद्रावती इस्‍पात योजना को परवान चढ़ने के लिए भी काफी श्रम किया। विश्‍वेश्‍वरैया सतत कार्य करने वाले व्‍यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उन्‍होंने 100 वर्ष से अधिक का जीवन पाया और जीवन की अन्तिम घड़ी तक वे कभी खाली नहीं बैठे। 14 अप्रैल सन 1962 को उनका देहान्‍त हुआ। विश्‍वेश्‍वरैया के पुरस्‍कार एवं सम्‍मान: विश्‍वेश्‍वरैया धुन के पक्‍के, लगनशील और ईमानदार इंजीनियर के रूप में जाने जाते हैं। वे कठिन परिश्रम और ज्ञान के पुजारी थे। उन्‍होंने अपने कार्यों के द्वारा समाज में जो प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त की, वह बिरले लोगों को ही नसीब होती है। उनकी कार्यनिष्‍ठा एवं योग्‍यता से प्रसन्‍न होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्‍हें ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया। आपने कई पुस्तके भी लिखी जिनका प्रकाशन भी हुआ। डॉ0 विश्‍वेश्‍वरैया के योगदान को दृष्टिगत रखते हुए उन्‍हें जादवपुर विश्‍वविद्यालय, पटना विश्‍वविद्यालय एवं प्रयाग विश्‍वविद्याय ने डी.एस.सी. की मानद उपाधि प्रदान की। इसके अतिरिक्‍त काशी विश्‍वविद्यालय ने उन्‍हें डी.लिट तथा मैसूर विश्‍वविद्यालय एवं बम्‍बई विश्‍वविद्यालय ने उन्‍हें एल.एल.डी की उपाधियों से सम्‍मानित किया। उनकी राष्‍ट्रसेवा को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार ने उन्‍हें सन 1955 में भारत के सर्वोच्‍च सम्‍मान ‘भारत रत्‍न’ से विभूषित किया। 1961 में उनके 100 वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्‍य में देश ने उनका शताब्‍दी समारोह मनाया। भारत सरकार ने उनके सम्‍मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।डॉ0 मोक्षगुण्‍डम् विश्‍वेश्‍वरैया आज हमारे बीच नहीं हैं। पर उन्‍होंने भारत निर्माण के लिए इतने कार्य किये हैं, कि जब तक यह संसार रहेगा, वे ‘आधुनिक भारत के विश्‍वकर्मा’ के रूप में याद किये जाते रहेंगे।आपकी म्रत्यु 12 अप्रैल 1962 को बंगलौर मैं हुई थी।

Kalpana chavla life story


भारतीय कल्पना चावला का जन्म हरियाणा के कर्नल में हुआ था। आपका जन्म 17 मार्च 1962 में हुआ था।कल्पना का संस्कृत में मतलब है कल्पना करना इमेजिनेशन उड़ान में उसकी रुचि जेआरडी टाटा , जो एक अग्रणी भारतीय पायलट और उद्योगपति थे उनसे प्रेरित हो कर हुई थी.।कल्पना ने टैगोर पब्लिक स्कूल, करनाल से स्कूली शिक्षा ली और वह 1982 में चंडीगढ़, भारत, में पंजाब इंजीनियरिंग से आगे की पढाई की और 1984 में टेक्सास विश्वविध्यालय (Texas University) से एरोस्पेस इंजनियरिंग (Aerospace Engineering) में मास्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री ली. 1988 में कल्पना ने नासा (NASA) के एम्स रिसर्च सेंटर (Ames Research Center) में काम करना शुरू किया. 1994१ में कल्पना चावला का नासा के द्वारा चयन किया गया और मार्च 1995 में अन्तरिक्ष यात्रियों के 15वें ग्रुप में कल्पना चावला का अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चयन हुआ. जानसन स्पेस सेंटर (Johnson Space Center) में एक साल के प्रशिक्षण के बाद कल्पना चावला की अन्तरिक्ष यात्री के प्रतिनिधि के रूप में तकनीकी क्षेत्रों के नियुक्ति की गयी. यहाँ पर उनके दो प्रमुख काम थे रोबोटिक उपकरणों (Robotic Equipments) का विकास और स्पेस शटल (Space Shuttle) को नियंत्रित करने वाले साफ्टवेयर की शटल एवियोनिक्स प्रयोगशाला (Shuttle Avionics Integration Laboratory) में टेस्टिंग करना.कल्पना चावाला की प्रथम उड़ान एस टी एस 87 कोलम्बिया (STS 87 Columbia) शटल से सम्पन्न हुई. इसकी अवधि 19 नवम्बर 1997 से 5 दिसम्बर 1997 थी. इसमें उन परीक्षणों पर जोर दिया गया कि अन्तरिक्ष में भारहीनता किस तरह से भौतिक क्रियाओं को प्रभावित करती है. कल्पना की दूसरी और आखिरी उड़ान 16 जनवरी 2003 को स्पेस शटल कोलम्बिया से शुरू हुई. यह 16 दिन का अन्तरिक्ष मिशन था, जो पूरी तरह से विज्ञान और अनुसन्धान पर आधारित था. इस मिशन में अन्तरिक्ष यात्रियों ने 2 दिन काम किया था और 80 परिक्षण और प्रयोग सम्पन्न किये थे. लेकिन 01 फरवरी 2003 को कोल्म्बियाँ स्पेस शटल लेंडिंग से पहले ही दुर्घटना ग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अन्तरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गयी ।कल्पना चावाला के साक्षात्कार के कुछ अंश उनकी दूसरी उड़ान से पहले... प्रश्न ...क्या आप बतायेंगी कि आपको अन्तरिक्ष के विषय में कैसे रूचि हुई और इतनी की इसने आपको नासा की और मोड़ दिया आप यहाँ कैसे आयीं ? यहाँ विज्ञाना की कौन सी चीज ने आपको आकर्षित किया ..? क्या आपको इस से सहायता मिली ? कल्पना ...जब में भारत के हाई स्कूल में पढ़ रही थी तो मैं सोचा करती थी की मैं बहुत भाग्यशाली हूँ जो करनाल जैसे शहर में जन्मी ..जहाँ पर उस समय भी फ्लाइंग क्लब थे ..मैंने छोटे छोटे पुष्पक विमान उड़ते हुए देखती थी .मैं और मेरा भाई कभी कभी साइकल चालते हुए इन उड़ते हुए विमानों को देखा करते ..साथ साथ मैं अपने पिता जी से पूछती रहती कि क्या मैं इन वायुयानों में बैठ कर उड़ सकती हूँ ? हमारे पिता जी हमें फ्लाइंग क्लब ले जाया करते और पुष्पक विमानों में बैठा कर सैर कराया करते थे ..मैंने समझती हूँ वहीँ से मुझे एरोस्पेस इंजनियरिंग के प्रति रूचि हुई ..उम्र के साथ मैंने भारत के जे आर डी टाटा का नाम सुना ..जिन्होंने भारत में मेल भेजने के लिए वायुयानों का प्रयोग किया तभी इन्ही सब बातो के कारण जब मैं पढ़ रही थी कोई मुझसे पूछता कि तुम बड़ी हो कर क्या बनोगी तो मैं कहती एरोस्पेस इंजीनियर .....मैं भाग्यशाली थी कि मुझे पंजाब कालेज में एरोस्पेस इंजिनयरिंग में जगह मिल गयी यही मेरा सबसे प्रिय विषय था ... प्रश्न ..क्या आप बता सकती है कि किन किन लोगों ने आपके जीवन को प्रभावित किया या अब भी आपके लिए प्रेरणा के स्रोत हैं ..? कल्पना ...मुझे जीवन में अनेक लोगों से प्रेरण मिली सबसे अधिक अपने अध्यापकों और किताबों से... कल्पना चावला की दूसरी अन्तरिक्ष यात्रा के बारे में अनोखी बाते। (1) प्रथम भारतीय अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री जन्म यहाँ भारत में हुआ बाद मे आपने अमेरिका कइ नागरिकता ले ली। (2) 1994 में कल्पना का अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चयन हुआ था। (3) अन्तरिक्ष में जाने वाली दूसरी भारतीय महिला ..पहले यात्री राकेश शर्मा थे (4) फ्रांसीसी जान पियर से शादी जो एक फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर थे। (5) स्पेस शटल की यह 13वीं उड़ान थी (6) सन २००३ में सम्पन स्पेस शटल की ५वी उड़ान थी।

Thursday, 11 February 2016

Thomson life


ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जोसेफ जॉन थॉम्सन (Sir Joseph John Thomson) का जन्म हुआ था।18 दिसम्बर 1856 को। जेजेथाम्सनसेपहलेकैथोडकिरणों (Cathode Rays) कीखोजहोचुकीथी।ज्ञातरहेकियदिकिसीनिर्वातनली (Vacuum Tube) मेंदोइलेक्ट्रोडलगाकरउनकेबीचउच्चविभव (High Potential) दियाजायेतोऋणात्मकइलेक्ट्रोडयानिकैथोडसेविशेषप्रकारकीअदृश्यकिरणेंनिकलतीहैंजिन्हेंकैथोडकिरणेंकहाजाताहै।एकअर्सेतककैथोडकिरणोंकेगुणधर्मोंऔरप्रकृतिकेबारेमेंलोगोंकोकोईजानकारीनहींहुई।फिरइसबारेमेंजेजेथाम्सननेकुछएक्सपेरीमेन्टकिये। पहलेएक्सपेरीमेन्टमेंउसनेपायाकिकैथोडकिरणेंचुम्बकीयक्षेत्रमेंविक्षेपितहोजातीहैं।इसविक्षेपणकोज्ञातकरकेथाम्सननेनिष्कर्षनिकालाकिकैथोडकिरणेंएकसमानआवेशकेबहुतसूक्ष्मकणोंकाप्रवाहहोतीहैं। अपनेपरिणामकोऔरकन्फर्मकरनेकेलिएथाम्सननेदूसराएक्सपेरीमेन्टकिया।इसमेंउसनेइनकिरणोंकोविद्युतक्षेत्र (Electric Field) सेगुजारा।उसनेपायाकिकिरणेंविद्युतक्षेत्रकीधनात्मकदिशामेंहल्कीसीविक्षेपितहुईं।इससेयहस्पष्टहोगयाकिकैथोडकिरणेंऋणआवेशितकणोंकाप्रवाहहोतीहैं। अपनेतीसरेएक्सपेरीमेन्टमेंथाम्सननेइनकणोंकेआवेशऔरद्रव्यमानकाअनुपातज्ञातकियाऔरयहपायाकियहअनुपातहमेशाएकहीआताहै।बादमेंथाम्सननेइनकाआवेशज्ञातकरनेकेलिएएकविधिभीखोजनिकाली।इनएक्सपेरीमेन्टकेआधारपरकन्फर्महोगयाकिकैथोडसेहमेशाएकहीप्रकृतिकेऋणआवेशितकणनिकलरहेहैं।थाम्सनद्वाराखोजेगयेइनकणोंकोजी-स्टोनीनामकवैज्ञानिकनेनामदिया ‘इलेक्ट्रान’।इलेक्ट्रानकीखोजकेलिएथाम्सनकोवर्ष 1906 कानोबुलपुरस्कारदियागया। अपनीखोजकेबादथाम्सननेपदार्थकेसूक्ष्मतमकणपरमाणुकीपरिकल्पनाकुछइसतरहकीकि ‘परमाणुएकधनआवेशितगोलाहोताहैजिसमेऋणआवेशितइलेक्ट्रानजगहजगहधंसेरहतेहैं।हालांकिउसकीयहपरिकल्पनाबादमेंरदरफोर्डकेप्रयोगोंद्वारागलतसिद्धहोगयीकिन्तुयहएटामिकमाडलकीदिशामेंमनुष्यकापहलाप्रयासजरूरकहाजायेगा। इलेक्ट्रानकीखोजकेअलावाआईसोटोपकीखोजकाश्रेयभीथाम्सनकोहीजाताहै।आईसोटोपऐसेपरमाणुओंकोकहतेहैंजोहोतेतोहैंएकहीतत्वके, किन्तुउनकापरमाणुभारअलगअलगहोनेकेकारणउनकेगुणएकदूसरेसेभिन्नहोजातेहैं।उदाहरणकेलिएपानीहाईड्रोजनआक्साइडहोताहैजोजीवनकामूलहै।किन्तुहाईड्रोजनकेआइसोटोपसेबनाभारीपानीड्यूटीरियमआक्साइडजहरीलाहोताहै।औरपरमाणुरियेक्टरमेंकाम आताहै। आपकी मृत्यु 30 अगस्त 1940 में हुई।

Jagdish chandra basu life


जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर, 1858 को बिक्रमपुर हुआ था, जो अब ढाका , बांग्लादेश का हिस्सा है । आपके पिता श्री भगवान सिंह बसु डिप्टी कलेक्टर थे। उस दौर में अफसर लोग अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढाकर अफसर बनाना चाहते थे। परन्तु पिता श्री भगवान सिंह बसु अपने बेटे को अफसर नही बल्की सच्चा देश सेवक बनाना चाहते थे। इसलिए जगदीशचंद्र बसु को पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया, वहाँ अधिकतर किसानों और मछुवारों के बच्चे पढते थे। वे पढाई भी करते थे, साथ-साथ खेती और दूसरे कामों में अपने घर वालों का हाँथ भी बँटाते थे। उन बच्चों के साथ रहकर बसु ने जीवन की वास्तविक शिक्षा को अपनाया। वहीं उन्हे शारीरिक श्रम करने की प्रेरणा मिली। सबको समान समझने की भावना पैदा हुई, मातृभाषा से प्रेम भी हो गया। पेङ-पौधों के बारे में जब उनके सवालों का उत्तर बचपन में स्पष्ट नही मिला तो वे बङे होने पर उनकी खोज में लग गये। बचपन के प्रश्न जैसेः- माँ पेङ के पत्ते तोङने से क्यों रोकती थी? रात को उनके नीचे जाने से क्यों रोकती थी? अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण आगे चलकर उन्होंने अपनी खोजों से पूरे संसार को चकित कर दिया।लंदन से रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात भारत वापस आ गये। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी विज्ञान के अध्यापक बने। कॉलेज में उस समय अधिकतर अंग्रेज शिक्षक ही थे। प्रिंसीपल भी अंग्रेज थे। वहाँ भारतियों के साथ भेदभाव बरता जाता था। समान कार्य हेतु अंग्रेजों के मुकाबले भारतीयों को कम वेतन दिया जाता था। बचपन से ही उन्होने अपने देश और जाति के स्वाभिमान को समझा था अतः उन्होने इस अन्याय का डटकर सामना किया। भारतियों को कम वेतन देने का कारण ये भी था कि उन्हे विज्ञान की पढाई के योग्य नही समझा जाता था। जगदीश चंद्र बसु के विरोध जताने पर वहाँ के प्रिंसिपल ने उनका वेतन और कम कर दिया, जिसे बसु ने लेने से इंकार कर दिया। बगैर वेतन के वे अपना काम करते रहे। आर्थिक तंगी के कारण उन्हे अनेक परेशानियों का सामना करना पङा किन्तु वे धैर्य के साथ अपनी बात पर अङे रहे। परिणाम स्वरूप उन्हे उनके स्वाभीमान का उचित फल मिला। उनकी ढृणता के आगे कॉलेज वालों को झुकना पङा। वे अन्य भारतियों को भी पूरा वेतन देने को तैयार हो गये। जगदीशचंद्र बसु की नौकरी भी पक्की कर दी गई तथा उनका बकाया वेतन भी उन्हे मिल गया। बसु पढाने के बाद अपना शेष समय वैज्ञानिक प्रयोग में लगाते थे। उन्होने ऐसे यंत्रो का आविष्कार किया जिससे बिना तार के संदेश भेजा जा सकता था। उनके इसी प्रयोग के आधार पर आज के रेडियो काम करते हैं। जगदीशचंद्र बसु ही बेतार के तार के वास्तविक आविष्कारक हैं परंतु परिस्थिति वश इसका श्रेय उन्हे नही मिल सका। बसु हार मानने वाले इंसान नही थे, उन्होने पेङ-पौधों पर अध्यन करना शुरु किया वैसे भी इसमें तो उनकी बचपन से जिज्ञासा थी। पेङ-पौधों पर की गई खोज उनके लिए वरदान सिद्ध हुई। उनकी खोज ने ये सिद्ध कर दिया कि पौधे भी सजीवों के समान सांस लेते हैं, सोते जागते हैं और उन पर भी सुख-दुख का असर होता है। उन्होने ऐसा यंत्र बनाया, जिससे पेङ-पौधों की गति अपने आप लिखी जाती थी।इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ (crescograph) कहा जाता है । लंदन स्थित रॉयल सोसाइटी ने उनके आविष्कार को एक अद्भुत खोज कहा और उन्हे रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनित कर लिया। इसी खोज को प्रदर्शित करते समय उनके साथ बहुत ही मजेदार घटना घटी। पेरिस में उन्हे पौधों पर तरह-तरह के जहरों का असर दिखाना था। उन्होने एक पौधे पर पोटेशीयम साइनाइड का प्रयोग किया किन्तु पौधा मुरझाने की बजाय और अधिक खिल उठा। पोटेशिय साइनाइड बहुत तेज किस्म का जहर होता है। उसका पौधे पर उलटा असर देख कर उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होने उसे चखा तो वो चीनी थी। वहीं वो कैमिस्ट भी था जिससे पोटेशियम साइनाइड उन्होने मँगाया था। कैमिस्ट ने कहा कि “कल मेरे पास एक नौकर पोटेशियम साइनाइड लेने आया था, मैने सोचा कहीं ये आत्महत्या न कर ले अतः मैने इसे चीनी का पाउडर दे दिया था।“जगदीशचंद्र बसु निरंतर नई खोज करते रहे, 1915 में उन्होने कॉलेज से अवकाश लेकर लगभग दो साल बाद “बोस इन्स्ट्यूट” की स्थापना की। जो ‘बोस विज्ञान मंदिर’ के नाम से प्रख्यात है। 1917 में सरकार ने उन्हे सर की उपाधी से सम्मानित किया। सर जगदीश चंद्र बसु केवल महान वैज्ञानिक ही नही थे, वे बंगला भाषा के अच्छे लेखक और कुशल वक्ता भी थे। विज्ञान तो उनके सांसो में बसता था। 23 नवंबर, 1937 को आपकी म्रत्यु हो गई

Sunday, 7 February 2016

arkmidiz life


आपका जन्म लगभग 287 ई.पू. सिराक्यूज़, सिसली मैग्ना ग्रीसिया में हुआ।आपने क्षेत्र गणित, भौतिकी, अभियांत्रिकी, खगोलशास्त्र का अध्ययन किया। आपके आविष्कार तथा कार्य आर्किमिडिज़ सिद्धांत, आर्किमिडिज़ पेच, द्रव्य स्थिति-विज्ञान, लीवर, अतिसूक्ष्म राशियाँ आदि है।आप प्राचीन यूनान में रहने वाले गणितज्ञ, भौतिकज्ञ, इंजीनियर, आविष्कारक और खगोलशास्त्री थे। आपको पाश्चात्य सभ्यता के महानतम वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है। भौतिकी को इन्होंने स्थिति-विज्ञान, द्रव्य स्थिति-विज्ञान और लीवर के सिद्धान्त प्रदान किए। इन्होंने कई नई मशीनें भी ईजाद कीं, जिनमें शामिल हैं घेराबंदी तोड़ने के लिए यंत्र और आर्किमिडिज़ पेच। इसके अलावा इन्होंने ऐसी मशीनों की परिकल्पना की जो पानी से जहाजों को उठा सकती थीं और दर्पणों के प्रयोग से नावों पर आग लगा सकती थीं; आधुनिक प्रयोगों से इन मशीनों की वास्तविकता सामने आई है। आर्किमिडिज़ को प्राचीन संसार का महानतम गणितज्ञ माना जाता है और आजतक के महानतम गणितज्ञों में गिना जाता है।इन्होंने शून्यीकरण विधि का प्रयोग करके परवलय की चाप के नीचे का क्षेत्रफल निकाला और पाइ का अत्यंत सटीक परिमाण निकाला। इन्होंने आर्किमिडिज़ कुण्डली, परिक्रमण की सतह का घनफल और बहुत बड़ी संख्याओं को लिखने के नए तरीके निकाले। इनके बारे में प्रसिद्ध है कि स्नान करते हुए इन्हें अकस्माक विचार आया कि सोने में मिलावट कैसे पकड़ी जाए और ये नग्न ही "यूरेका! यूरेका!" "मिल गया! मिल गया!" चिल्लाते हुए सिराक्यूज़ की सड़कों पर दौड़ने लगे। इनका यह भी कथन प्रसिद्ध है, "मुझे यदि खड़े होने की जगह मिल जाए तो मैं (लीवर की मदद से) पृथ्वी को हिला सकता हूँ। सिराक्यूज़ की घेराबंदी में एक रोमन सैनिक ने आर्किमिडिज़ को मार डाला, जबकि सेना को आदेश थे कि इन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए। कहा जाता है कि इनके अंतिम शब्द थे, "मेरे वृत्तों को खराब मत करो", जो इन्होंने उस रोमन सैनिक को कहे।सिसरो ने इनके मकबरे का वर्णन करते हुए बताया है कि उसपर एक वेलनाकार और उसके मध्य में समानाकार गेंद बने हुए थे। आर्किमिडीज़ ने प्रमाणित किया था कि गेंद का क्षेत्रफल और घनफल वेलनाकार का दो-तिहाई होता है और ये इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते थे। इनके आविष्कार तो बहुत प्रसिद्ध हुए, लेकिन इनके गणितीय रचनाओं को प्राचीन काल में अधिक महत्त्व नहीं मिला। अलेक्सेंड्रिया के गणितज्ञ इन्हें पढ़ते और उद्धृत भी करते थे, लेकिन इनकी कृतियों को सबसे पहले 530 ईस्वी के लगभग ही एकत्रित किया जा सका। यह काम मिलेटस के इसीडोर ने किया और फिर छठी शताब्दी ईस्वी में ही यूटोसियस की टीकाओं के माध्यम से सारा संसार आर्किमिडिज़ की कृतियों से अवगत हुआ। इनकी कृतियों की कुछ पाण्डुलिपियाँ मध्ययुग तक बची रहीं और पुनर्जागरण के दौरान कई वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की प्रेरणा का स्रोत बनीं।1906 में आर्किमिडिज़ पालिम्पसेस्ट के नाम से मिली अन्य कृतियों से पता लगा कि इन्होंने गणितीय फार्मूले कैसे निकाले।आपकी मृत्यु 212 ई.पु. हुई थी

madam kyuri life


मैडम क्युरी एक रशियन महिला थीं। उनका जन्म वारसा में 7 नवंबर 1867 को हुआ था। माता पिता सुयोग्य अध्यापक थे। माँ अध्यापिका तथा पिता प्रोफेसर थे। माता-पिता की शिक्षाओं का असर मैरी क्युरी पर भी पड़ा। वे बचपन से ही पढाई लिखाई में तेज थीं। माता पिता के प्रोत्साहन तथा पढाई में रुची के कारण वे सभी प्रारंभिक कक्षाओं में अवल्ल रहीं। परंतु बचपन में ही घर की तंग आर्थिक स्थिति के कारण उन्हे अपनी बहन के पास पढने के लिए पेरिस जाना पड़ा।मैरी के पिता को जनता के प्रति हो रही नाइंसाफी पसंद नही थी। उनकी इस विद्रोहात्मक नीति के कारण उनकी तनख्वाह आधी कर दी गई थी।पेरिस के स्कूल में पढते हुए मैरी क्युरी ने अपनी शिक्षा का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त करते हुए अपनी प्रतिभा के कारण सभी अध्यापकों की प्रिय शिष्या थीं। मैरी क्युरी फ्रांस में डॉक्टरेट पूरा करने वाली पहली महिला हैं। उनको पेरिस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने वाली पहली महिला होने का भी गौरव प्राप्त हुआ। यहीं उनकी मुलाकात पियरे क्यूरी से हुई जो उनके पति बने। इस वैज्ञानिक दंपत्ति ने 1898 में पोलोनियम की महत्त्वपूर्ण खोज की। कुछ ही महीने बाद उन्होंने रेडियम की भी खोज की। जो की चिकित्सा विज्ञान और रोगों के उपचार में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी खोज साबित हुई। 1903 में मेरी क्यूरी ने पी-एच.डी. पूरी कर ली। इसी वर्ष इस दंपत्ति को रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। 1911 में उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी मिला। विज्ञान की दो शाखाओं में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली मैरी क्युरी पहली महिला वैज्ञानिक हैं।मैरी क्युरी का सफर इतना आसान नही था। शुरुवात से उन्होने संघर्ष किया था। घर की आर्थिक स्थिति सुधारने हेतु अध्ययन काल में ही कुछ बच्चों को ट्युशन पढाती थीं। वैवाहिक जीवन में भी पति की असमय मृत्यु ने उनकी जिम्मेदारियों को और बढा दिया। दो बेटीयों का भविष्य और पति द्वारा देखे सपनो को सफल बनाना, मैरी क्युरी का उद्देश्य था। शोध कार्य के दौरान एकबार उनका हाँथ बहुत ज्यादा जल गया था। फिर भी मैरी क्युरी का हौसला नही टूटा।मैरी क्युरी की आर्दश शिक्षा का ही परिणाम था कि उनकी दोनों बेटीयों को भी नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबल पुरस्कार मिला। मैरी क्युरी का एक मात्र ऐसा परिवार है जिसके सभी सदस्यों को नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है।मैरी क्युरी के द्वारा पेरिस में क्यूरी फाउंडेशन का सफल निर्माण किया गया, जहां उनकी बहन ब्रोनिया को निदेशक बनाया गया। अपने पति पियरे क्युरी के सपनो को पुरा करने के उद्देश्य से मैरी क्युरी अमेरीका गई, जहाँ उन्हे बहुत सम्मान प्राप्त हुआ और उन्हे प्रयोगशाला हेतु लगभग एक लाख डॉलर का चंदा मिला एवं वहाँ के प्रेसीडेंट ने उन्हे रेडियम की वह अनमोल धातु, जो संसार में कम और मूल्यवान वस्तु है, अहदनामे के रूप में प्रदान की, जिसके अंर्तगत ये अधिकार दिया गया कि इस सम्पत्ती पर मैडम क्युरी के बाद उनकी संतानो का परंपरागत अधिकार होगा। परंतु त्याग एवं उदारता की प्रतीमूर्ति मैडम क्युरी ने इस अहदनामें की शर्त में परिवर्तन करा के इसे फ्रांस की प्रयोगशाला में जमा करा दिया। शर्त में ये लिखवा दिया कि इसका उपयोग सार्वजनिक लाभ के लिए संसार भर में किया जायेगा। और करुणा की भावना से ओत-प्रोत, मानवता की मशाल को सदैव प्रज्वलित करने वाली मैडम क्युरी ने नोबल पुरस्कार से प्राप्त राशी को सार्वजनिक कार्यों हेतु दान कर दिया था। उन्होने ने जेनिया के अस्पताल में बच्चों की सहायता हेतु काफी धनराशी दान कर दी तथा 1914 के विश्व युद्ध में पिङित लोगों की सहायता के लिए स्वीडन में दान दिया। युद्ध के मोर्चों पर वे स्वंय गईं और वहाँ उन्होने रेडियम तथा एक्स-रे उपचार के अनेक केन्द्र खोले। घायलों की सक्रिय सेवा हेतु उन्होने एक बङी गाङी में चलता-फिरता अस्पताल खोला था। जिसके माध्यम से लगभग डेढ-दो लाख रोगियों की सेवा उन्होने स्वंय की थी। अनेक उपलब्धियों तथा धन-दौलत की अधिकता के बावजूद उनका जीवन सरल और साधारण था। नए शोधों के प्रति उनकी कर्मठशीलता तथा निरंतर कार्य की वजह से 1934 में ही अतिशय रेडिएशन के प्रभाव के कारण मैरी क्यूरी का निधन हो गया।

Saturday, 6 February 2016

kirchaf life


आपका जन्म 12 मार्च 1824 को कोनिग्स्बर्ग, पूर्वी प्रशिया में हुआ था।आपने जर्मनीकी राष्ट्रीयता धारण की। आप एक महान भौतिकशास्त्री थे। आपने बर्लिन विश्वविद्यालय, ब्रेस्लाउ विश्वविद्यालय, हीडलबर्ग विश्वविद्यालय में कार्य तथा अध्ययन किया।आपने किरचाफ के परिपथ के नियम,किरचॉफ के तापीय,विकिरण के नियम,किरचॉफ के स्पेक्ट्रोस्कोपी के नियम दिए थे। आपकोपुरस्कार रूमफ़ोर्ड मेडल से सम्मानित जिया गया था।आपकी मृत्यु 17 अक्टोबर 1887 में हई थी।

nikola tesla life


निकोलस टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को क्रोशिया मइ हउअ था। आपने विद्युत तथा चुम्बक के क्षेत्रों में अनेक क्रांतिकारी आविषकार किये। जिसमें विद्युत वितरण का आधुनिक सिस्टम अर्थात एसी पावर सिस्टम, एसी मोटर का आविष्कार इत्यादि प्रमुख हैं। प्रारम्भ में कुछ कंपनियों में काम करने के पश्चात टेस्ला ने पेरिस में कान्टीनेन्टल एडीसन कंपनी ज्वाइन की। इस बीच उसने कुछ अलग प्रकार के डायनमो विकसित किये। तभी उन्होंने अमेरिका के महान आविष्कारक थामस अल्वा एडीसन के साथ काम किया ।और वह अमेरिका रवाना हो गया। एडीसन के साथ काम करते हुए उसने उसकी कंपनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, लेकिन शीघ्र ही दोनों में विवाद हो गया, जो बड़े पैमाने पर विद्युत वितरण प्रणाली को लेकर था। उस समय अमेरिका में एडीसन की आविष्कृत डीसी विद्युत वितरण व्यवस्था लागू थी। डीसी (DC) यानि डायरेक्ट करेंट (Direct Current) ऐसी विद्युत धारा को कहते हैं जो हमेशा एक ही दिशा में बहती है। जैसे की विद्युत सेल से बनने वाली धारा।
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');
}());
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<script async="" src="//cdn.chitika.net/getads.js" type="text/javascript"></script>टेस्ला ने डीसी की कमियों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया और एसी (AC) विद्युत वितरण व्यवस्था लागू करने की बात कही। एसी यानि अलटरनेटिंग करेंट (Alternative Current) लगातार अपनी दिशा बदलती रहती है। इस धारा की यह विशेषता होती है कि इसका वोल्टेज ट्रांसफोर्मर द्वारा बढ़ाकर काफी दूर तक भेजा जा सकता है। जबकि डीसी में ऐसा संभव नहीं। साथ ही एसी चालित मोटर और दूसरे उपकरणों में डीसी की अपेक्षा कम बिजली खर्च होती है।टेस्ला कओ ac का ध्यान साइकिल के टायर को घुमते ही देखकर आया। चूंकि उस समय तक डीसी सिस्टम काफी बड़े पैमाने पर लागू था और एडीसन कंपनी डीसी उपकरणों को ही बना रही थी अत: एडीसन ने इस नये सिस्टम का विरोध किया। नतीजे में टेस्ला ने उसकी कंपनी को अलविदा कह दिया और उद्योगपति जार्ज वेस्टिंग हाउस के साथ मिलकर नई कंपनी की बुनियाद डाली जिसने एसी करेंट की उपयोगिता को दुनिया के सामने रखा। उनका एक अन्य महत्वपूर्ण आविष्कार एसी विद्युत मोटर (AC Electric Motor) है जिसने डीसी विद्युत सिस्टम को पूरी तरह हाशिये पर ला दिया। उसने नियाग्रा जल प्रपात (Niagara Falls) पर पहला जल विद्युत पावर स्टेशन (First water electric power station) तैयार किया, जिसके बाद न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में एसी विद्युत वितरण सिस्टम को स्वीकार कर लिया गया। आपने यह सिद्धान्त दिया कि वायुमंडल के बाहरी आयनमंडल से होकर रेडियो तरंगें पूरी दुनिया में भेजी जा सकती है। उसने रेडियो में प्रयुक्त होने वाली टेस्ला रॉड का भी आविष्कार किया और उसका रेडियो के असली आविष्कारक को लेकर मारकोनी के साथ काफी लंबा मुकदमा भी चला। उसने वायरलेस पावर सप्लाई (Wireless power supply) का विचार दिया जो बाद में लेसर किरणों (Laser Rays) का आधार बना। अपने एक प्रेजेंटेशन में उसने लाखों वोल्ट की आकाशीय बिजली बनाकर सबको दंग कर दिया था। एक बार उसने अपने उपकरण टेस्लास्कोप (Teslascope) पर कुछ अज्ञात सिग्नल रिकार्ड किये । आपकी मृत्यु 7 जनवरी 1943 मइ हुई थी।

Thursday, 4 February 2016

galiliyo life


गैलीलियो का जन्म 15 फ़रवरी 1564 को ईटली मे था। आआपका Astronomy, physics, natural philosophy, mathematics में विशेष योगदान रहा। जीवन परिचय संपादित करें चिरसम्मत यांत्रिकी न्यूटन का गति का द्वितीय नियम इतिहास · समयरेखा स्थैतिकी · गतिकी / गति विज्ञान · शुद्ध गति विज्ञान · अनुप्रयुक्त यांत्रिकी · खगोलीय यांत्रिकी · सांतत्यक यांत्रिकी · सांख्यिकीय यांत्रिकी न्यूटनीय यांत्रिकी (सदिशीय यांत्रिकी विश्लेषणात्मक यांत्रिकी: लाग्रांजीय यांत्रिकी हेमिल्टोनीय यांत्रिकी मूलभूत अवधारणा दिक् · समय · वेग · चाल · द्रव्यमान · त्वरण · गुरुत्व · बल · आवेग · बलाघूर्ण / आघूर्ण / बलयुग्म · संवेग · कोणीय संवेग · जड़त्वाघूर्ण · निर्देश तंत्र · ऊर्जा · गतिज ऊर्जा · स्थितिज ऊर्जा · यांत्रिक कार्य · शक्ति · कल्पित कार्य · डी' अलम्बर्ट सिद्धान्त दृढ़ पिण्ड · दृढ़ पिण्ड गतिकी · आयलर समीकरण · गति · न्यूटन के गति नियम · न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त · गति के समीकरण · जड़त्वीय निर्देश तंत्र · अजड़त्वीय निर्देश तंत्र · घूर्णन निर्देश तंत्र · आभाषी बल · रेखिक गति · समतल कण गति यांत्रिकी · विस्थापन सदिश · सापेक्ष वेग · घर्षण · सरल आवर्त गति · सरल आवर्ती दोलक · कम्पन · अवमन्दन · अवमन्दन अनुपात घुर्णन गति वृतिय गति · समरूप वृतिय गति · असमरूप वृतिय गति · अपकेन्द्रिय बल · अभिकेन्द्रिय बल · अभिकेन्द्रिय बल (घुर्णी निर्देश तन्त्र) · प्रतिक्रियाशील अभिकेन्द्रिय बल · कोरॉलिस बल · लोलक · कोणीय चाल · कोणीय त्वरण · कोणीय वेग · कोणीय आवर्ती · कोणीय विस्थापन वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली · आइज़क न्यूटन · केप्लर · होरोकस · एडमंड हैली · आयलर · डी'अलम्बर्ट · अलेक्से क्लाड क्लेरो · जोसेफ लुई लाग्रांज · पियेर सिमों लाप्लास · विलयम रोवन हैमिल्टन · सायमन-डेनिस पॉइसन इस संदूक को: देखें • संवाद • संपादन इस महान विचारक का जन्म आधुनिक इटली के पीसा नामक शहर मे एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। आधुनिक इटली का शहर पीसा 15 फ़रवरी 1564 केा महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैली के जन्म को भी ईश्वर की रचना का दोष मानकर ऐतिहासिक भूल कर बैठा था। गैलीलियो के द्वारा प्रतिपादित सिंद्वांतो से धार्मिक मान्यताओं का खंडन होता था जिसके लिये गैलीलियो को ईश्वरीय मान्यताओं से छेडछाड करने के लिये सारी उम्र कारावास की सजा सुनायी गयी। इनके पिता विन्सौन्जो गैलिली उस समय के जाने माने संगीत विशेषज्ञ थे। वे ‘ ल्यूट ’ नामक वाद्य यंत्र बजाते थे, यही ल्यूट नामक यंत्र बाद में गिटार और बैन्जो के रूप में विकसित हुआ। अपनी संगीत रचना के दौरान विन्सौन्जो गैलिली ने तनी हुयी डोरी या तार के तनाव और उससे निकलने वाले स्वरों का गहनता से अध्ययन किया तथा यह पाया कि डोरी या तार के तनाव और उससे निकलने वाली आवाज में संबंध है। पिता के द्वारा संगीत के लिये तनी हुयी डोरी या तार से निकलने वाली ध्वनियों के अंतरसंबंधों के परिणामों का वैज्ञानिक अध्ययन उनके पुत्र गैलीलियो द्वारा किया गया। इस अध्ययन को करने के दौरान बालक गैलीलियो के मन में सुग्राहिता पूर्ण प्रयोग करते हुये उनके परिणामो को आत्मसात करने की प्रेरणा प्रदान की। इनको परीक्षा मूलक (प्रयोगात्मक) विज्ञान का जनक माना जाता है। इन्होंने दोलन का सूत्र का प्रतिपादन किया। इन्होंने दूरबीन का आविष्कार किया। उसने दूरदर्शी यंत्र को अधिक उन्नत बनाया। उसकी सहायता से अनेक खगोलीय प्रेक्षण लिये तथा कॉपरनिकस के सिद्धान्त का समर्थन किया। उन्हें आधुनिक प्रायोगिक खगोलिकी का उपयोग किया।उन्होंने पाया कि प्रकृति के नियम एक दूसरे कारकों से प्रभावित होते हैं और किसी एक के बढने और घटने के बीच गणित के समीकरणों जैसे ही संबंध होते है। इसलिये उन्होनेकहा किः-‘ ईश्वर की भाषा गणित है।‘ इस महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक ने ही प्रकाश की गति को नापने का साहस किया। इसके लिये गैलीलियो और उनका एक सहायक अंधेरी रात में कई मील दूर स्थित दो पहाड़ की चोटियों पर जा बैठे। जहां से गैलीलियो ने लालटेन जलाकर रखी, अपने सहायक का संकेत पाने के बाद उन्हें लालटेन और उसके खटके के माध्यम से प्रकाश का संकेत देना था। दूसरी पहाड़ी पर स्थित उनके सहायक को लालटेन का प्रकाश देखकर अपने पास रखी दूसरी लालटेन का खटका हटाकर पुनः संकेत करना था। इस प्रकार दूसरी पहाड़ की चोटी पर चमकते प्रकाश को देखकर गैलीलियो को प्रकाश की गति का आकलन करना था। इस प्रकार गैलीलियो ने जो परिणाम पाया वह बहुत सीमा तक वास्तविक तो न था परन्तु प्रयोगों की आवृति और सफलता असफलता के बाद ही अभीष्‍ट परिणाम पाने की जो मुहिम उनके द्वारा प्रारंभ की गयी वह अद्वितीय थी। कालान्तर में प्रकाश की गति और उर्जा के संबंधों की जटिल गुल्थी को सुलझाने वाले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने इसी कारण उन्हें ‘आधुनिक विज्ञान का पिता ‘ के नाम धार्मिक प्रवृ़ित के थे परन्तु पुरानी धार्मिक मान्यताओंसे जाना जाता हे को विवेकशीलता और प्रयोग के माध्यम से सिद्व करना चाहते थे। वर्ष 1609 में गैलीलियो को एक ऐसी दूरबीन का पता चला जिसका अविष्कार हालैंड में हुआ था, इस दूरबीन की सहायता से दूरस्थ खगोलीय पिंडों को देख कर उनकी गति का अध्ययन किया जा सकता था। गैलीलियो ने इसका विवरण सुनकर स्वयं ऐसी दूरबीन का निर्माण कर डाला जो हालैंड में अविष्कृत दूरबीन से कहीं अधिक शक्तिशाली थी। इसके आधार पर अपने प्रेक्षण तथा प्रयोगों के माध्यम से गैलीलियो ने यह पाया कि पूर्व में व्याप्त मान्यताओं के विपरीत बृहमांड में स्थित पृथ्वी समेत सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है। इससे पूर्व कॉपरनिकस ने भी यह कहा था कि पृथ्वी समेत सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है जिसके लिये उन्हे चर्च का कोपभाजन बनना पडा था। अब प्रयोग अैार विवेक पर आधारित परिणामों के आधार पर गैलीलियेा ने भी यही होना सिद्व पाया। उस समय तक यह सर्वमान्य सिद्वांत था कि ब्रहमांड के केन्द्र में पृथ्वी स्थित है तथा सूर्य और चन्द्रमा सहित सभी आकाशीय पिंड लगातार पृथ्वी की परिक्रमा करते है। इस मान्यता को तद्समय के धर्माचार्यों का समर्थन प्राप्त था। अपने प्रयोगों के आधार पर प्राप्त परिणामों के कारण गैलीलियो ने पुरानी अवधारणाओं के विरूद्व खडे होने का निर्णय लिया। जब गैलीलियो ने यह सिद्वांत सार्वजनिक किया तो चर्च ने इसे अपनी अवज्ञा माना और इस अवज्ञा के लिये गैलीलियो को चर्च की ओर से कारावास की सजा सुनायी गयी। गैलीलियो के द्वारा दिये गये विचार ने तद्समय मनुष्य के चिंतन की दिशा केा नये रूप में स्वीकारने को विवश कर दिया। सामाजिक और धार्मिक प्रताडना के चलते पूर्व से व्याप्त मान्यताओं और विश्वासों के विपरीत प्रतिपादित सिंद्वांतो के साथ वे अधिक दिन तक खडे नहीं रह सके। वर्ष 1633 में 69 वर्षी य वृद्व गैलीलियो को चर्च की ओर से यह आदेश दिया गया कि वे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगते हुये यह कहें कि धार्मिक मान्यताओं के विरूद्व दिये गये उनके सिद्वांत उनके जीवन की सबसे बडी भूल थी जिसके लिये वे शर्मिंदा हैं। उन्होने ऐसा ही किया परन्तु इसके बाद भी उन्हें कारावास में डाल दिया गया। उनका स्वास्थ्य लगातार बिगडता रहा और इसी के चलते कारावास की सजा गृह-कैद अर्थात अपने ही घर में कैद में रहने की सजा में बदल दिया गया। अपने जीवन का आखिरी दिन भी उन्होंने इसी कैद में ही बिताया। हमेशा से पोप की निगरानी में रहने वाली वेटिकन सिटी स्थित इसाई धर्म की सर्वाेच्च संस्था ने 1992 में यह स्वीकार किया किया कि गैलीलियो के मामले में निर्णय लेने में उनसे गलती हुयी थी। इस प्रकार एक महान खगोल विज्ञानी, गणितज्ञ, भौतिकविद एवं दार्शनिक गैलीलियो के संबंध में 1633 में जारी आदेश कर अपनी ऐतिहासिक भूल स्वीकार करने में चर्च को साढे तीन सौ सालों से भी अधिक का समय लगा। वर्ष 1609 में दूरबीन के निर्माण और खगोलीय पिंडों के प्रेक्षण की घटना के चार सौ सालों के बाद 400वीं जयंती के रूप में वर्ष 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष के रूप में मनाकर इस महान वैज्ञानिक को श्रद्वांजलि अर्पित कर अपनी भूल का प्राश्चित्य करने का प्रयास किया।आपकी म्रत्यु 8फरवरी 1642 में हुई थी ।

charls babaj life


आपका जन्म 26 दिसम्बर 1791में लंदन में हुआ था आपका गणित, इंजीनियरिंग, राजनीतिक अर्थव्यवस्था, कंप्यूटर विज्ञान में विशेष रूचि थी। चार्ल्स बैबेज एक अंग्रेजी बहुश्रुत थे वह एक गणितज्ञ, दार्शनिक, आविष्कारक और यांत्रिक इंजीनियर थे, जो वर्तमान में सबसे अच्छे कंप्यूटर प्रोग्राम की अवधारणा के उद्धव के लिए जाने जाते हैं या याद किये जाते है। चार्ल्स बैबेज को "कंप्यूटर का पिता" माना जाता है। बैबेज को अंततः अधिक जटिल डिजाइन करने के लिए नेतृत्व में पहली यांत्रिक कंप्यूटर की खोज करने का श्रेय दिया जाता है। अन्य क्षेत्रों में अपने विभिन्न काम अपना शतक के कई बहुज्ञ (व्यक्ति) के बीच "पूर्व प्रख्यात 'के रूप में वर्णित किये जाने के लिए उसे प्रेरित किया है। बैबेज के द्वारा निर्मित अपूर्ण तंत्र के कुछ हिस्सों लंदन साइंस म्यूजियम में प्रदर्शित कर रहे हैं। 1991 में, एक पूरी तरह से कार्य कर रहा अंतर इंजन बैबेज की मूल योजना से निर्माण किया गया था। 19 वीं सदी में प्राप्त Engineering tolerance के लिए निर्मित, समाप्त इंजन की सफलता ने यह संकेत की बैबेज का मशीन काम करता है । चार्ल्स बैबेज ने अक्टूबर 1810 में, ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिला लिया वह पहले से ही समकालीन गणित के कुछ भागों को स्वयं अध्यन किया करते थे, वह रॉबर्ट वुडहाउस, यूसुफ लुइस Lagrange और मैरी Agnesi को पढ़ा करते थे नतीजे के तौर पर उन्हें कैम्ब्रिज में उपलब्ध मानक गणितीय शिक्षा में निराशा प्राप्त हुई चार्ल्स बैबेज और उनके कुछ मित्रगणों "जॉन Herschel, जॉर्ज मयूर" और कई अन्य मित्रों ने मिलकर 1812 में विश्लेषणात्मक सोसायटी का गठन किया ।आपकी म्रत्यु 18 अक्टोबर1871 में हुई थी।

Wednesday, 3 February 2016

abdul kalam life


आपका जन्म 15 अक्टूबर 1931, रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ था।एक वैज्ञानिक और इंजिनियर के तौर पर उन्होंने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर कार्य किया।डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम एक प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक और भारत के 11वें राष्ट्रपति थे। उन्होंने देश के कुछ सबसे महत्वपूर्ण संगठनों (डीआरडीओ और इसरो) में कार्य किया। उन्होंने वर्ष 1998 के पोखरण द्वितीय परमाणु परिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ कलाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और मिसाइल विकास कार्यक्रम के साथ भी जुड़े थे। इसी कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन’ भी कहा जाता है। वर्ष 2002 में कलाम भारत के राष्ट्रपति चुने गए और 5 वर्ष की अवधि की सेवा के बाद, वह शिक्षण, लेखन, और सार्वजनिक सेवा में लौट आए। उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।अबुल पकिर जैनुलअबिदीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक मुसलमान परिवार मैं हुआ। उनके पिता जैनुलअबिदीन एक नाविक थे और उनकी माता अशिअम्मा एक गृहणी थीं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थे इसलिए उन्हें छोटी उम्र से ही काम करना पड़ा। अपने पिता की आर्थिक मदद के लिए बालक कलाम स्कूल के बाद समाचार पत्र वितरण का कार्य करते थे। अपने स्कूल के दिनों में कलाम पढाई-लिखाई में सामान्य थे पर नयी चीज़ सीखने के लिए हमेशा तत्पर और तैयार रहते थे। उनके अन्दर सीखने की भूख थी और वो पढाई पर घंटो ध्यान देते थे। उन्होंने अपनी स्कूल की पढाई रामनाथपुरम स्च्वार्त्ज़ मैट्रिकुलेशन स्कूल से पूरी की और उसके बाद तिरूचिरापल्ली के सेंट जोसेफ्स कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ से उन्होंने सन 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक किया। उसके बाद वर्ष 1955 में वो मद्रास चले गए जहाँ से उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1960 में कलाम ने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की।मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए। कलाम ने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलीकाप्टर का डिजाईन बना कर किया। डीआरडीओ में कलाम को उनके काम से संतुष्टि नहीं मिल रही थी। कलाम पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा गठित ‘इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ के सदस्य भी थे। इस दौरान उन्हें प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के साथ कार्य करने का अवसर मिला। वर्ष 1969 में उनका स्थानांतरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में हुआ। यहाँ वो भारत के सॅटॅलाइट लांच व्हीकल परियोजना के निदेशक के तौर पर नियुक्त किये गए थे। इसी परियोजना की सफलता के परिणामस्वरूप भारत का प्रथम उपग्रह ‘रोहिणी’ पृथ्वी की कक्षा में वर्ष 1980 में स्थापित किया गया। इसरो में शामिल होना कलाम के कैरियर का सबसे अहम मोड़ था और जब उन्होंने सॅटॅलाइट लांच व्हीकल परियोजना पर कार्य आरम्भ किया तब उन्हें लगा जैसे वो वही कार्य कर रहे हैं जिसमे उनका मन लगता है। 1963-64 के दौरान उन्होंने अमेरिका के अन्तरिक्ष संगठन नासा की भी यात्रा की। परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना, जिनके देख-रेख में भारत ने पहला परमाणु परिक्षण किया, ने कलाम को वर्ष 1974 में पोखरण में परमाणु परिक्षण देखने के लिए भी बुलाया था। सत्तर और अस्सी के दशक में अपने कार्यों और सफलताओं से डॉ कलाम भारत में बहुत प्रसिद्द हो गए और देश के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम गिना जाने लगा। उनकी ख्याति इतनी बढ़ गयी थी की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने कैबिनेट के मंजूरी के बिना ही उन्हें कुछ गुप्त परियोजनाओं पर कार्य करने की अनुमति दी थी। भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का प्रारम्भ डॉ कलाम के देख-रेख में किया। वह इस परियोजना के मुख कार्यकारी थे। इस परियोजना ने देश को अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें दी है। जुलाई 1992 से लेकर दिसम्बर 1999 तक डॉ कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सचिव थे। भारत ने अपना दूसरा परमाणु परिक्षण इसी दौरान किया था। उन्होंने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आर. चिदंबरम के साथ डॉ कलाम इस परियोजना के समन्वयक थे। इस दौरान मिले मीडिया कवरेज ने उन्हें देश का सबसे बड़ा परमाणु वैज्ञानिक बना दिया। वर्ष 1998 में डॉ कलाम ने ह्रदय चिकित्सक सोमा राजू के साथ मिलकर एक कम कीमत का ‘कोरोनरी स्टेंट’ का विकास किया। इसे ‘कलाम-राजू स्टेंट’ का नाम दिया गया। एक रक्षा वैज्ञानिक के तौर पर उनकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि के मद्देनज़र एन. डी. ए. की गठबंधन सरकार ने उन्हें वर्ष 2002 में राष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी लक्ष्मी सहगल को भारी अंतर से पराजित किया और 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लिया। डॉ कलाम देश के ऐसे तीसरे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही भारत रत्न ने नवाजा जा चुका था। इससे पहले डॉ राधाकृष्णन और डॉ जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनने से पहले ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा चुका था। उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें ‘जनता का राष्ट्रपति’ कहा गया। अपने कार्यकाल की समाप्ति पर उन्होंने दूसरे कार्यकाल की भी इच्छा जताई पर राजनैतिक पार्टियों में एक राय की कमी होने के कारण उन्होंने ये विचार त्याग दिया। 12वें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के समाप्ति के समय एक बार फिर उनका नाम अगले संभावित राष्ट्रपति के रूप में चर्चा में था परन्तु आम सहमति नहीं होने के कारण उन्होंने अपनी उमीद्वारी का विचार त्याग दिया। राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद का समय राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद डॉ कलाम शिक्षण, लेखन, मार्गदर्शन और शोध जैसे कार्यों में व्यस्त रहे और भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिल्लोंग, भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर, जैसे संस्थानों से विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर जुड़े रहे। इसके अलावा वह भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर के फेलो, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी, थिरुवनन्थपुरम, के चांसलर, अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई, में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी रहे। उन्होंने आई. आई. आई. टी. हैदराबाद, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और अन्ना यूनिवर्सिटी में सूचना प्रौद्योगिकी भी पढाया था। कलाम हमेशा से देश के युवाओं और उनके भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में बातें करते थे। इसी सम्बन्ध में उन्होंने देश के युवाओं के लिए “व्हाट कैन आई गिव’ पहल की शुरुआत भी की जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का सफाया है। देश के युवाओं में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2 बार (2003 & 2004) ‘एम.टी.वी. यूथ आइकॉन ऑफ़ द इयर अवार्ड’ के लिए मनोनित भी किया गया था। वर्ष 2011 में प्रदर्शित हुई हिंदी फिल्म ‘आई ऍम कलाम’ उनके जीवन से प्रभावित है। शिक्षण के अलावा डॉ कलाम ने कई पुस्तकें भी लिखी जिनमे प्रमुख हैं – ‘इंडिया 2020: अ विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘विंग्स ऑफ़ फायर: ऐन ऑटोबायोग्राफी’, ‘इग्नाइटेड माइंडस: अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’, ‘मिशन इंडिया’, ‘इंडोमिटेबल स्पिरिट’ आदि। देश और समाज के लिए किये गए उनके कार्यों के लिए, डॉ कलाम को अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। लगभग 40 विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी और भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया।

Monday, 1 February 2016

aryabhatt life


आर्याभट जन्म सन 476 तथा स्थान कुसुमपुर अथवा अस्मक था.आप गनितज्ञ, खगोलशाष्त्री थे आर्यभट्‍ट प्राचीन समय के सबसे महान खगोलशास्त्रीयों और गणितज्ञों में से एक थे। विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उनके कार्य आज भी वैज्ञानिकों को प्रेरणा देते हैं। आर्यभट्‍ट उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने बीजगणित (एलजेबरा) का प्रयोग किया। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘आर्यभटिया’ (गणित की पुस्तक) को कविता के रूप में लिखा। यह प्राचीन भारत की बहुचर्चित पुस्तकों में से एक है। इस पुस्तक में दी गयी ज्यादातर जानकारी खगोलशास्त्र और गोलीय त्रिकोणमिति से संबंध रखती है। ‘आर्यभटिया’ में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 नियम भी दिए गए हैं। आज हम सभी इस बात को जानते हैं कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है और इसी कारण रात और दिन होते हैं। मध्यकाल में ‘निकोलस कॉपरनिकस’ ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था पर इस वास्तविकता से बहुत कम लोग ही परिचित होगें कि ‘कॉपरनिकस’ से लगभग 1 हज़ार साल पहले ही आर्यभट्ट ने यह खोज कर ली थी कि पृथ्वी गोल है और उसकी परिधि अनुमानत: 24835 मील है। सूर्य और चन्द्र ग्रहण के हिन्दू धर्म की मान्यता को आर्यभट्ट ने ग़लत सिद्ध किया। इस महान वैज्ञानिक और गणितग्य को यह भी ज्ञात था कि चन्द्रमा और दूसरे ग्रह सूर्य की किरणों से प्रकाशमान होते हैं। आर्यभट्ट ने अपने सूत्रों से यह सिद्ध किया कि एक वर्ष में 366 दिन नहीं वरन 365.2951 दिन होते हैं आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ ‘आर्यभटिया’ में अपना जन्मस्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 (476) लिखा है। इस जानकारी से उनके जन्म का साल तो निर्विवादित है परन्तु वास्तविक जन्मस्थान के बारे में विवाद है। कुछ स्रोतों के अनुसार आर्यभट्ट का जन्म महाराष्ट्र के अश्मक प्रदेश में हुआ था और ये बात भी तय है की अपने जीवन के किसी काल में वे उच्च शिक्षा के लिए कुसुमपुरा गए थे और कुछ समय वहां रहे भी थे। हिन्दू और बौध परम्पराओं के साथ-साथ सातवीं शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ भाष्कर ने कुसुमपुरा की पहचान पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के रूप में की है। यहाँ पर अध्ययन का एक महान केन्द्र, नालन्दा विश्वविद्यालय स्थापित था और संभव है कि आर्यभट्ट इससे जुड़े रहे हों। ऐसा संभव है कि गुप्त साम्राज्य के अन्तिम दिनों में आर्यभट्ट वहां रहा करते थे। गुप्तकाल को भारत के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है आर्यभट्ट के कार्यों की जानकारी उनके द्वारा रचित ग्रंथों से मिलती है। इस महान गणितग्य ने आर्यभटिय, दशगीतिका, तंत्र और आर्यभट्ट सिद्धांत जैसे ग्रंथों की रचना की थी। विद्वानों में ‘आर्यभट्ट सिद्धांत’ के बारे में बहुत मतभेद है । ऐसा माना जाता है कि ‘आर्यभट्ट सिद्धांत’ का सातवीं शदी में व्यापक उपयोग होता था। सम्प्रति में इस ग्रन्थ के केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं और इतना उपयोगी ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में भी विद्वानों के पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है। आर्यभटीय उनके द्वारा किये गए कार्यों का प्रत्यक्ष विवरण प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट ने स्वयं इसे यह नाम नही दिया होगा बल्कि बाद के टिप्पणीकारों ने आर्यभटीय नाम का प्रयोग किया होगा। इसका उल्लेख भी आर्यभट्ट के शिष्य भास्कर प्रथम ने अपने लेखों में किया है। इस ग्रन्थ को कभी-कभी आर्य-शत-अष्ट (अर्थात आर्यभट्ट के 108 – जो की उनके पाठ में छंदों कि संख्या है) के नाम से भी जाना जाता है। आर्यभटीय में वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। वास्तव में यह ग्रन्थ गणित और खगोल विज्ञान का एक संग्रह है। आर्यभटीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति शामिल हैं। इसमे सतत भिन्न (कँटीन्यूड फ़्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण (क्वड्रेटिक इक्वेशंस), घात श्रृंखला के योग (सम्स ऑफ पावर सीरीज़) और ज्याओं की एक तालिका (Table of Sines) शामिल हैं। आर्यभटीय में कुल 108 छंद है, साथ ही परिचयात्मक 13 अतिरिक्त हैं। यह चार पदों अथवा अध्यायों में विभाजित है आर्य-सिद्धांत खगोलीय गणनाओं के ऊपर एक कार्य है। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, यह ग्रन्थ अब लुप्त हो चुका है और इसके बारे में हमें जो भी जानकारी मिलती है वो या तो आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर के लेखनों से अथवा बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों जैसे ब्रह्मगुप्त और भास्कर प्रथम आदि के कार्यों और लेखों से। हमें इस ग्रन्थ के बारे में जो भी जानकारी उपलब्ध है उसके आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह कार्य पुराने सूर्य सिद्धांत पर आधारित है और आर्यभटीय के सूर्योदय की अपेक्षा इसमें मध्यरात्रि-दिवस-गणना का उपयोग किया गया है। इस ग्रन्थ में ढेर सारे खगोलीय उपकरणों का भी वर्णन है। इनमें मुख्य हैं शंकु-यन्त्र, छाया-यन्त्र, संभवतः कोण मापी उपकरण, धनुर-यन्त्र / चक्र-यन्त्र, एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र, छत्र-यन्त्र और जल घड़ियाँ। उनके द्वारा कृत एक तीसरा ग्रन्थ भी उपलब्ध है पर यह मूल रूप में मौजूद नहीं है बल्कि अरबी अनुवाद के रूप में अस्तित्व में है – अल न्त्फ़ या अल नन्फ़। यह ग्रन्थ आर्यभट्ट के ग्रन्थ का एक अनुवाद के रूप में दावा प्रस्तुत करता है, परन्तु इसका वास्तविक संस्कृत नाम अज्ञात है। यह फारसी विद्वान और इतिहासकार अबू रेहान अल-बिरूनी द्वारा उल्लेखित किया गया है। आर्यभट्ट का योगदान आर्यभट का भारत और विश्व के गणित और ज्योतिष सिद्धान्त पर गहरा प्रभाव रहा है। भारतीय गणितज्ञों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले आर्यभट ने 120 आर्याछंदों में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और उससे संबंधित गणित को सूत्ररूप में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ में प्रस्तुत किया है। उन्होंने गणित के क्षेत्र में महान आर्किमिडीज़ से भी अधिक सटीक ‘पाई’ के मान को निरूपित किया और खगोलविज्ञान के क्षेत्र में सबसे पहली बार यह घोषित किया गया कि पृथ्वी स्वयं अपनी धुरी पर घूमती है। स्थान-मूल्य अंक प्रणाली आर्यभट्ट के कार्यों में स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। हालांकि उन्होंने शुन्य दर्शाने के लिए किसी प्रतीक का प्रयोग नहीं किया, परन्तु गणितग्य ऐसा मानते हैं कि रिक्त गुणांक के साथ, दस की घात के लिए एक स्थान धारक के रूप में शून्य का ज्ञान आर्यभट्ट के स्थान-मूल्य अंक प्रणाली में निहित था। यह हैरान और आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि आजकल के उन्नत साधनों के बिना ही उन्होंने लगभग डेढ़ हजार साल पहले ही ज्योतिषशास्त्र की खोज की थी। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं, कोपर्निकस (1473 से 1543 इ.) द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत की खोज आर्यभट हजार वर्ष पहले ही कर चुके थे। “गोलपाद” में आर्यभट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। इस महान गणितग्य के अनुसार किसी वृत्त की परिधि और व्यास का संबंध 62,832 : 20,000 आता है जो चार दशमलव स्थान तक शुद्ध है। आर्यभट्ट कि गणना के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2 % कम है।आपकी मृत्यु 550 में हुआ था।

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न्यूटन का जन्म 4 जनवरी 1643 को हुआ था. उसके जन्म से तीन माह पहले ही पिता की मृत्य हो गई थी. बाद में उसकी माँ ने दूसरा विवाह कर लिया था. वह जीवन भर अविवाहित रहा. शायद इसी अकेलेपन ने उसे अतिवादिता का शिकार बना दिया था. वह जितना अपने मित्रों को टूट कर चाहता था, विरोधियों के लिए उतना ही आक्रामक था. उस समय के अन्य वैज्ञानिकों रॉबर्ट हुक (Robert Hooke), क्रिस्टियन हाइगेन्स (Christiaan Huygens), विल्हेम लाइब्निज़ (Wilhelm Leibniz) और जॉन फ्लाम्स्टीड (John Flamsteed) के साथ उसका विवाद जगप्रसिद्ध है. धार्मिक रूप से वह बाइबिल तथा ईश्वर में अटूट विश्वास रखता था किंतु ईसाइयों की आम मान्यता ट्रिनिटी में उसकी आस्था न थी. उसका माना था कि ट्रिनिटी (Trinity) को मानने वालों ने मूल बाइबिल में उलट फेर किया है. (ट्रिनिटी - जीसस को ईश्वर का बेटा मानना.) न्यूटन की पुस्तक फिलास्फिया प्रिन्सिपिया मैथेमैटिका को अब तक का महानतम लिखित वैज्ञानिक कार्य माना जाता है. सन 2005 में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे ने न्यूटन को सर्वाधिक लोकप्रिय वैज्ञानिक ठहराया है.आपकी मृत्यु 31 मार्च 1727 को हुई.।